7.10.1 NASSCOM v. Ajay Sood (2005)
NASSCOM v. Ajay Sood & Ors.
Delhi High Court, 2005 (119) DLT 596
तथ्य
प्रतिवादियों ने NASSCOM के नाम से फर्जी ईमेल भेजकर नौकरी का झांसा देकर व्यक्तिगत जानकारी एकत्र की (फ़िशिंग)।
निर्णय
- फ़िशिंग को अवैध घोषित: पहला भारतीय निर्णय
- साइबर टॉर्ट मान्य: Common Law के तहत
- ₹16 लाख मुआवज़ा: प्रतिवादियों पर
- निषेधाज्ञा: भविष्य में ऐसी गतिविधि पर रोक
महत्व
यह निर्णय भारत में साइबर सिविल दायित्व की नींव रखता है। फ़िशिंग को पहली बार कानूनी रूप से परिभाषित किया गया।
7.10.2 श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015)
Shreya Singhal v. Union of India
Supreme Court, (2015) 5 SCC 1
तथ्य
दो लड़कियों को फेसबुक पोस्ट के लिए धारा 66A के तहत गिरफ्तार किया गया। इसे चुनौती दी गई।
निर्णय
- धारा 66A निरस्त: अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन
- धारा 69A वैध: पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ
- धारा 79 की व्याख्या: "वास्तविक ज्ञान" स्पष्ट किया
- अवरोधन प्रक्रिया: प्राकृतिक न्याय अनिवार्य
महत्व
इंटरनेट स्वतंत्रता पर सबसे महत्वपूर्ण भारतीय निर्णय। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण के बीच संतुलन।
7.10.3 Yahoo India v. Akash Arora (1999)
Yahoo Inc. v. Akash Arora & Anr.
Delhi High Court, 1999 (78) DLT 285
तथ्य
प्रतिवादी ने "yahooindia.com" डोमेन नाम पंजीकृत किया और Yahoo जैसी सेवाएं प्रदान करने लगा।
निर्णय
- डोमेन नाम भी ट्रेडमार्क: संरक्षण योग्य
- पासिंग ऑफ: साइबरस्पेस में भी लागू
- भ्रामक समानता: उपभोक्ताओं को भ्रमित करता है
- निषेधाज्ञा मंजूर: डोमेन उपयोग पर रोक
महत्व
भारत में डोमेन नाम विवाद पर पहला प्रमुख निर्णय। साइबरस्पेस में ट्रेडमार्क संरक्षण की नींव।
7.10.4 Tata Sons v. Greenpeace (2011)
Tata Sons Ltd. v. Greenpeace International
Delhi High Court, 2011
तथ्य
Greenpeace ने "Turtle vs Tata" नामक ऑनलाइन गेम बनाया जो Tata के ट्रेडमार्क का उपयोग करता था।
निर्णय
- पैरोडी की अनुमति: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- निषेधाज्ञा अस्वीकृत: जनहित में आलोचना वैध
- ट्रेडमार्क असीमित नहीं: आलोचना की अनुमति
महत्व
ऑनलाइन पैरोडी और आलोचना पर संतुलित दृष्टिकोण। ट्रेडमार्क और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
7.10.5 Google India v. Visakha Industries (2020)
Google India Pvt. Ltd. v. Visakha Industries
Supreme Court, 2020
तथ्य
Google के प्लेटफॉर्म पर Visakha Industries के विरुद्ध मानहानिकारक सामग्री थी।
निर्णय
- धारा 79 Safe Harbour: शर्तों के साथ उपलब्ध
- "वास्तविक ज्ञान": न्यायालय के आदेश से या स्पष्ट सूचना से
- Due Diligence: मध्यस्थ की जिम्मेदारी
महत्व
मध्यस्थ दायित्व पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट दिशानिर्देश। Safe Harbour का दायरा निर्धारित।
7.10.6 Myspace v. Super Cassettes (2017)
Myspace Inc. v. Super Cassettes Industries Ltd.
Delhi High Court, 2017
तथ्य
Super Cassettes ने Myspace पर अपने गानों के अनधिकृत अपलोड के लिए मुकदमा किया।
निर्णय
- "विशिष्ट ज्ञान" आवश्यक: सामान्य ज्ञान पर्याप्त नहीं
- URL स्तर पर नोटिस: विशिष्ट सामग्री की पहचान आवश्यक
- Safe Harbour का संरक्षण: शर्तों के पालन पर
महत्व
कॉपीराइट उल्लंघन में मध्यस्थ की जिम्मेदारी पर स्पष्टता। "विशिष्ट ज्ञान" की व्याख्या।
ये निर्णय साइबर सिविल मुकदमेबाज़ी की नींव हैं। प्रत्येक निर्णय को विस्तार से पढ़ें और अपने मामलों में उद्धृत करें।
मुख्य बिंदु
- NASSCOM: फ़िशिंग = साइबर टॉर्ट
- श्रेया सिंघल: 66A निरस्त, 69A वैध
- Yahoo: डोमेन नाम = ट्रेडमार्क संरक्षण
- Tata v Greenpeace: पैरोडी की अनुमति
- Google v Visakha: Safe Harbour का दायरा
- Myspace: "विशिष्ट ज्ञान" आवश्यक
